रोज़ा किसी क्षेत्र में महारत हासिल करने के लिए कुछ दिनों की विशेष ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है ताकि हमेशा के लिए वह गुण हमारे दिलो-दिमाग में घर कर जाए!
रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी
रोज़ा रखने का मक़सद परहेज़गार बनना है !.. मुस्लिम को परहेज़गार तो होना ही चाहिए! अल्लाह का स्पष्ट आदेश है
"ऐ ईमान वालों, तुम पर रोजा फ़र्ज़ (अनिवार्य)किया गया, जिस प्रकार तुमसे पहले के लोगों पर रोज़ा फ़र्ज़ किया गया था ताकि तुम परहेजगार (संयमी) बनो!" (सूरह बक़रह 183)
परहेज़ या बचना, अल्लाह ने जिन कामों से बचने को कहा है उनसे बचना ( वो काम न करना)यानी परहेज़ करना!
परहेज़गारी हमारी आदत बन जाए, हम अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त करके उनपे हुकूमत करने लगें, इसलिए यह एक महीने की विशेष ट्रेनिंग है ताकि हमें हर वक्त यह ख़्याल रहे कि झूठ नहीं बोलना है, हराम कमाई नहीं खाना है, सूद नहीं खाना है, रिश्वत नहीं लेना है, वादाखिलाफ़ी नहीं करना है, ज़िना नहीं करना है, अमानत में ख़यानत नहीं करना है,क़त्ल नहीं करना है,फ़िर्क़े नहीं बनाना है, वालिदैन के साथ बदसलूकी नहीं करना है.. यहां तक कि कुरआन मजीद में अल्लाह ने जिन कामों से बचने को कहा है उनसे बचना(परहेज़ करना)!... और अल्लाह ने जिन कामों को करने का हुक्म दिया है उनको करना... सच बोलना (हक़ बात कहना), हक़ बात कहने में जो परेशानी आए उन पर सब्र करना, दूसरों के साथ ख़ैर भलाइयां करना, जरूरतमंदों की मदद करना, अमले स्वालेह करना... आदि!.. अल्लाह के कानून की इताअत करना ही अल्लाह की इबादत है!
जब हम पूरे महीने की यह विशेष ट्रेनिंग कर लेंगे तो फिर पूरे साल हम बोलने से पहले सोचेंगे कि सच बोलें, खाने से पहले यह जानेंगे जो हम खाने जा रहे हैं वह कैसी कमाई का निवाला है मेहनत की कमाई (नेक कमाई) का या भ्रष्टाचार, ठगी, हकमारी, मिलावट खोरी, जमाखोरी, घटतौली, रिश्वत, बेईमानी, मक्कारी, झूठ, कमीशन, सूद... आदि से प्राप्त पैसे का!
इस ट्रेनिंग के दौरान हमें उन चीजों के इस्तेमाल से रोक दिया जाता है जो जायज़ हैं यानी सुबह से शाम तक खाना होते हुए भी हम खा नहीं सकते, पानी होते हुए भी पी नहीं सकते.. यह सब हमें बहादुर बनाने और इतना बहादुर बनाने के लिए ट्रेंड किया जाता है ताकि फिर हम अपनी नफ्स (इच्छाओं )को अपने वश में कर लें और ऐशों आराम में डूबने के बजाय ईमानदारी और मेहनत पर ध्यान दें, हरामखोरी से दूर होकर सच्चाई का मार्ग अपनाएं!... अगर इस ट्रेनिंग के बाद भी हम झूठ, लालच, बेईमानी, मक्कारी, हरामकमाई, मटरगश्ती,कायरता, पक्षपात और संकीर्णता.. आदि से दूर न हो सके तो इसका मक़सद ही पूरा नहीं होगा!.. और जब हम परहेज़गार नहीं होंगे तो अल्लाह हमसे क्यों खुश होगा?.. हमारा सारा ध्यान खुद को संयमी बनाने पर होना चाहिए!
रसूल स. ने अपने आखिरी भाषण में कहा है यदि किसी को श्रेष्ठता प्राप्त है तो भले कर्मों के कारण" इसलिए हमें भी उसी को श्रेष्ठ मानकर इज़्ज़त देना चाहिए जो भले काम करता हो, न कि धन दौलत संसाधन देखकर श्रेष्ठ (सम्मानित) और हीन का फैसला कर लेना चाहिए!
भले कर्म वही हैं जिनका हुक्म अल्लाह ने दिया है.. व्यक्तिगत भलाई जो हम अपने लिए करते हैं उसके अलावा दूसरों के साथ भलाई करना चाहिए.. भलाई का जज़्बा तभी पैदा होगा जब हम अल्लाह का हर हुक्म मानने लगेंगे, लोगों से प्रेम करने लगेंगे, घमंड और घृणा ख़त्म करके माफ़ करना और समझौता करना सीख जाएंगे, तब हम सबको बराबर समझने लगेंगे.. और संयमी(परहेजगार) बन जाएंगे!
तक़वा ही हमारी कामयाबी की जड़ है!
अमले स्वालेह करेगा वही जो मुत्तक़ी होगा!
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