किसने संवैधानिक प्रतिनिधित्व (आरक्षण) नहीं दिया और कौन नहीं चाहता आपके बच्चे सरकारी नौकरियां नहीं करें? (भाग-२)

 रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

इस दौरान भारत में एक और बड़ी घटना घटी, भिंडरवाला जो खालिस्तान आंदोलन का नेता था। जिसको कांग्रेस ने अकाल तख्त का विरोध करने के लिए खड़ा किया था, उसने स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया।

RSS और कांग्रेस ने योजना बनाई अब मंडल कमीशन आंदोलन को भड़काने के लिए हिंदुस्तान VS खालिस्तान का मामला खड़ा किया जाये। इंदिरा गांधी ने आर्मी प्रमुख जनरल सिन्हा को हटा दिया और एक साउथ के ब्राह्मण को आर्मी प्रमुख बनाया। जनरल सिन्हा ने इस्तीफा दे दिया। आर्मी में भूचाल आ गया। नये आर्मी प्रमुख ने इंदिरा गांधी के कहने पर ऑपरेशन ब्लू स्टार की योजना बनाई और स्वर्ण मंदिर के अंदर टैंक घुसा दिया। पूरी आर्मी हिल गई। पूरे सिक्ख समुदाय ने इसे अपना अपमान समझा और 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी को उनके दो पर्सनल गॉड्स बेअंत सिंह और सतवंत सिंह, दोनों अनुसूचित जाति के थे, ने इंदिरा गांधी को गोलियों से छलनी कर दिया।

'माओ'अपनी किताब 'ON CONTRADICTION' में लिखते हैं शासन वर्ग किसी एक षड्यंत्र को छुपाने के लिए दूसरा बड़ा षड्यंत्र करता है, पर वह नहीं जानता कि इससे वह अपने स्वयं के लिए कोई और संकट खड़ा कर देता है।

माओ कि यह कि यह बात भारतीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में सटीक साबित होती है।

मंडल कमीशन को दबाने वाले षड्यंत्र का बदला शासक वर्ग ने 'इंदिरा गांधी' की जान देकर चुकाया। इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद राजीव गांधी को नया प्रधानमंत्री मनोनीत कर दिया गया। जो आदमी 3 साल पहले पायलटी छोड़कर आया था, वह देश का 'मुग़ले आज़म' बन गया। इंदिरा गांधी की अचानक हत्या से सारे देश में सिक्खों के विरुद्ध माहौल तैयार किया गया। दंगे हुए। अकेले दिल्ली में 3000 सिक्खों का कत्लेआम हुआ जिसमें तत्कालीन मंत्री भी थे। उस दौरान राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह का फोन तक प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने रिसीव नहीं किये। उधर कांशीराम जी अपना अभियान जारी रखे हुए थे। उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी बीएसपी की स्थापना की और सारे देश में साइकिल यात्रा निकाली। कांशीराम जी ने एक नया नारा दिया "जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी।"

कांशीराम जी ने मंडल कमीशन का मुद्दा बड़ी जोर-जोर से प्रचारित किया, जिससे उत्तर भारत के पिछड़े वर्ग में एक नयी तरह की सामाजिक, राजनीतिक चेतना जागृत हुई। इसी जागृति का परिणाम था कि पिछड़े वर्ग में नया नेतृत्व जैसे कर्पूरी ठाकुर, लाल यादव, मुलायम सिंह यादव का उभरा हुआ। अब कांशीराम शोषित वंचित समाज के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे। वही 1984 का चुनाव हुआ पर इस चुनाव में कांशीराम ने सक्रियता नहीं दिखाई और राजीव गांधी को सुहानुभूति लहर का इतना फायदा हुआ की राजीव गांधी 413 सांसद चुनवा कर लाये। जो राजीव गांधी के नाना ना कर सके वह उन्होंने कर दिखाया। सरकार बनने के बाद फिर मंडल का जिन्न जाग गया। ओबीसी के सांसदों ने संसद में हंगामा शुरू कर दिये। शासक वर्ग ने फिर नयी व्यू रचना बनाने की सोची।

अब बामसेफ के अभियानों के कारण ओबीसी जागृत हो चुका था। अब शासक वर्ग के लिऐ मंडल कमीशन का विरोध करना संभव नहीं था। दो हजार साल के इतिहास में शायद ब्राह्मणों ने पहली बार कांशीराम जी के सामने असहाय महसूस किया। क्योंकि कोई भी राजनीतिक उद्देश्य इन तीन साधनों से प्राप्त किया जा सकता है, वह है-१- शक्ति संगठन 

की २- समर्थन जनता का, ३-दांव-पेंच नेता का। कांशीराम जी के पास तीनों कौशल थे और दांव-पेंच के मामले में वे ब्राह्मणों से 21 थे। अब यह समय था जब कांग्रेस और संघ की संपूर्ण राजनीति केवल कांशीराम जी पर ही केंद्रित हो गयी।

-------शेष अगले लेख में

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